*** Trigger Warning: Suicide ***

 

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या  के बाद सोशल मीडिया पर विभिन्न वार्तालापों की बाढ़ आ गई है। लेकिन क्या हम सही सवाल पूछ रहे हैं?

‘Committed suicide’ और ‘died by suicide’ जैसी illusionary binary न create करिए जनाब | सीधे social murder कहिए | Sophisticated manner में complex phenomenon को dilute मत करिए |

ऐसी illusionary binary create करने के पीछे एक उद्देश्य होता है | उदहारण के तौर पर consensual-non consensual sex की binary को ही देख लीजिए | इसमें समस्या यह है कि एक पीढ़ी consent define करने में खप जाती है | Ruling class की भाषा से बचिए | इसमें तरह-तरह के sophistication और abstraction का एक ही उद्देश्य होता है | यह बहुत दुखदायी है कि oppressed class को अपना दुःख व्यक्त करते वक़्त भी भाषा को लेकर इतना सचेत होना ही पड़ेगा क्योंकि ruling class हमेशा content से ज्यादा महत्व form को देता है |

ये ‘reach out’ वाला rant बहुत ही ज्यादा triggering है | अगर आप सचमुच चिंतित हैं और आपको फर्क पड़ता है तो सबसे पहले अपना pretentious पना छोड़िए | थोड़ी देर शांत रहना भी संवेदनाएँ व्यक्त करने का तरीका है | आपकी ready-made भावनाएँ toxic हैं | मत भूलिए कि आप human हैं, humanoid नहीं |

Depression में reach out करने का क्या मतलब होता है ये आपको बिलकुल नही पता | आप literally दो शब्द कहकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं | इस तरह के ही और भी rant हैं जैसे की ‘self love’ और ‘self care’ | इसको context से काटकर देखने और movement से अलग करके isolation में देखने से इसका मतलब ये निकलने लगा है कि भाई लोग तुम सब अपना खुद ही देख लो हम तुम्हारे लिए क्या ही करेंगे जब तुम खुद की care नहीं करते और खुद से प्यार नहीं करते |

ऐसी जटिल समस्याओं का समाधान करने के लिए समस्या के मूल कारणों का पता लगाना होगा | मूल कारणों से काटकर देखेंगे तो कोई समाधान नहीं निकलेगा | बस सब कोई अपनी जिम्मेदारी से हाथ धो लेने की भाषा ही develop करते रह जाएँगे |

Depressed इन्सान गहरे पानी में डूब रहा होता है और वो अपने हाथ-पैर चलाने की स्थिति में नही होता | ऐसे में हाथ बढाने का भार भी आप victim के कन्धों पर ही डाल देना चाहते हैं, जबकि ये काम आपका होता है |

Social structures की समझ बेहद ज़रूरी है | कोई भी phenomenon psychological होने से पहले social है,वो कोई innate या static चीज़ नहीं है | उदाहरण के तौर पर body shaming को इस तरह से negate नही किया जा सकता की तुम उन लोगों की बातें ignore कर दिया करो, क्योंकि जितना चिढोगे वो लोग उतना ही चिढ़ाएंगे | वास्तव में ऐसा बिलकुल नहीं होता | समस्या उसके सोचने में नही, बल्कि ऐसे घटिया समाज में है |

Movement से काटकर देखने की ही ये समस्या है कि ‘community care’, ‘self care’ के रूप में reduce हुआ है और ‘systemic failure’, ‘individual failure’ में, और अर्थ का अनर्थ हो गया है |

ये mental health awareness का ही हिस्सा होना चाहिए कि हम इसे inclusive बनाने के लिए, इसे affordable बनाए जाने के लिए आवाज़ उठायें, नही तो सबको therapist के पास जाने की महज़ सलाह भर देना किसी जुमले से कम नहीं होगा |

As a part of #Let’sVent, we are going to publish important pieces of venting and rage at the state of things with respect to mental health in India. Through this, we aim to provide a space to our thoughts that are raw, straight from the heart and extremely significant!

Prashant Singh
Prashant Singh

Prashant Singh is pursuing his Masters in Psychology from IGNOU, New Delhi.

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